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Indian Education System Problems: भारत की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति और सुधार की जरूरत

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वीरेंद्र कुमार मिश्र “बिरही”।

शिक्षा व्यवस्था पर सवाल: सरकारी स्कूलों की स्थिति और शिक्षा सुधार की आवश्यकता

देवरिया। आज से कुछ दशक पूर्व से शिक्षा प्रयोग के बुरे दौर से गुजर रही है। इसमें इतने प्रयोग और अनुप्रयोग हुए कि सुधारने की जगह इसका और अधिक ह्रास ही होता चला गया। आज शिक्षा एक व्यवसाय बन गई है। तमाम निजी फर्म इसमें पंजीकृत या अपंजीकृत रूप से सक्रिय हो गए हैं। खासकर नेत्री वर्ग, व्यवसायी वर्ग और संभ्रांत वर्ग बड़ी-बड़ी दुकानें खोलकर इसमें उतर आए हैं। इनकी आधुनिकता, अंग्रेजियत, अदाकारी, प्रदर्शन और लटके-झटके ने जनता को इतना आकर्षित किया कि लोग उसी ओर बह गए। मांग अधिक होने पर दाम बढ़ने की नीति इस पर भी लागू हो गई। एक का तीन तक लिया जाने लगा।

बड़े लोगों की बात छोड़ दें तो उनके पास अकूत संपदा है, वे कहां खर्च करें—यह उनकी समस्या है, लेकिन मध्यम वर्ग तबाह है, हलकान है, परेशान है। वह जाए तो कहां जाए? गरीब तबका खिचड़ी, जूता, मोजा, वजीफा आदि की सुविधा पाकर संतुष्ट है। उसे बस इतना ही चाहिए कि किसी तरह ताड़ी, शराब का जुगाड़ हो जाए। लड़का पढ़े या न पढ़े, इससे उसे विशेष मतलब नहीं है। मेहनत-मजदूरी, खोमचा, रिक्शा, दुकान, खेती-बारी, बटाई—इन्हीं से जीवन चल जाता है। ऐसे में वह सरकारी विद्यालय में नाम लिखाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है। सरकारें भी शायद यही चाहती हैं कि लोग अपनी समस्याओं में उलझे रहें—खाने-पीने, कपड़ा-लत्ता, शादी-ब्याह में ही व्यस्त रहें। यदि लोग पढ़-लिखकर होशियार हो गए तो शासन करना कठिन हो जाएगा।

सरकारी विद्यालय खिचड़ी वितरण, जनगणना, चुनाव कार्य, आपदा राहत और तरह-तरह के गैर-शैक्षणिक प्रशिक्षणों में व्यस्त रहते हैं। निजी विद्यालय और निजी अस्पताल न हों तो न लोग ठीक से पढ़ पाएंगे और न ही जी पाएंगे। आरक्षण से तैयार शिक्षक, डॉक्टर, नेता, मंत्री, अधिकारी और कर्मचारी अपनी क्षमता के अनुसार कार्य कर रहे हैं—और वे क्या करें?

गरीबों के नाम पर बनी सरकारें दशकों से केवल मार्केटिंग कर रही हैं। आजादी के 75-80 वर्ष बाद भी गरीब वहीं का वहीं है। कहीं-कहीं जो सुधार दिखाया जाता है, वह 80-90% कागजी आंकड़ों की बाजीगरी ही है। सरकारी विद्यालयों की बदहाली का 20% श्रेय शिक्षकों को और 80% सरकार को जाता है।

समस्याएं

  1. विद्यालयों में शिक्षकों का घोर अभाव है।
  2. इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है—भवन, डेस्क, बेंच आदि की समस्या बनी हुई है।
  3. आरक्षण, घूस, भ्रष्टाचार और नियोजन की प्रक्रिया के कारण अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति होती है।
  4. पुरस्कार वितरण प्रणाली पर भी सवाल उठते हैं; अधिकांश पुरस्कार पैरवी और चाटुकारिता के आधार पर मिलते हैं।

सुधार के सुझाव

यदि सरकार और समाज शिक्षा के प्रति गंभीर हैं तो निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए—

  1. शिक्षकों का चयन पूरी तरह पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त हो। शिक्षक को केवल नौकरी नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण और मानव निर्माण का सेवा क्षेत्र माना जाए।
  2. सरकारी विद्यालयों को पूरी तरह साधन-संपन्न बनाया जाए, आवश्यकता अनुसार शुल्क व्यवस्था लागू की जा सकती है ताकि वित्तीय समस्या न रहे।
  3. किसी भी प्रकार का गैर-शैक्षणिक कार्य न कराया जाए। केवल अपरिहार्य स्थिति में ही सहयोग लिया जाए और इसके लिए अलग व्यवस्था हो।
  4. समय पर वेतन और सम्मान सुनिश्चित किया जाए तथा कार्य मूल्यांकन योग्य और निष्पक्ष स्रोतों से हो।
  5. शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, अधिकारी और सरकार के बीच समन्वय स्थापित किया जाए। शिक्षा को रोजगारपरक, नैतिक और संस्कारित बनाया जाए।

यदि इन बिंदुओं पर गंभीरता से काम किया जाए तो शिक्षा व्यवस्था का स्तर निश्चित रूप से ऊपर उठ सकता है।

लेखक परिचय: वीरेंद्र कुमार मिश्र ‘विरही’

वीरेंद्र कुमार मिश्र ‘विरही’ पूर्व प्राचार्य हैं। इन्होंने एम.ए., बी.एड के साथ धर्म-रत्न एवं धर्म-विशारद की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। वे एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं, जिन्होंने रेडियो, दूरदर्शन, चित्रपट तथा मंचीय कलाकार के रूप में भी अपनी पहचान बनाई है। वे राष्ट्रीय संरक्षक के रूप में साहित्य शक्ति संस्थान से जुड़े हैं तथा राष्ट्रीय महासचिव (अ.भा.ब्रा. महासभा रा.) और प्रमुख महासचिव (अ.भा. सर्वजन हित पार्टी) जैसे दायित्वों का भी निर्वहन कर रहे हैं।

इनका संबंध उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के ग्राम विंदवालिया (पोस्ट नोनापर) से है। यह क्षेत्र साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से समृद्ध माना जाता है, जहाँ काव्य और लोकसंस्कृति की गहरी परंपरा रही है। वीरेंद्र कुमार मिश्र ‘विरही’ की रचनात्मक अभिव्यक्ति का क्षेत्र मुख्य रूप से हिंदी और भोजपुरी कविता है। उनकी रचनाओं में प्रेम और विरह की भावनाएँ विशेष रूप से देखने को मिलती हैं। उनकी साहित्यिक यात्रा को उनकी जीवन संगिनी का विशेष सहयोग और प्रेरणा प्राप्त हुई है, जिन्होंने उनकी लेखनी को निरंतर प्रोत्साहित किया।

उन्होंने लंबे समय तक बंगाल से लेकर बिहार तक शैक्षणिक सेवाएँ भी दी हैं और सामाजिक दायित्वों का भी सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। साहित्य सेवा के साथ-साथ वे समाज सेवा, संगीत एवं अन्य कला क्षेत्रों में भी सक्रिय रहे हैं। रेडियो, दूरदर्शन और मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से उन्होंने अपनी कला और साहित्यिक प्रतिभा का व्यापक परिचय दिया है।

totaramnews1@gmail.com

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7 thoughts on “Indian Education System Problems: भारत की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति और सुधार की जरूरत

  1. अच्छी लेखनी है चाचा जी। ऐसे ही लिखते रहिए। प्रणाम।

  2. बहुत ही सुन्दर विचार इसका देश हित में अक्षरशः पालन होना चाहिए।🙏🌹

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