रेनू द्विवेदी ने डॉ. विजय माथुर का किया स्वागत
लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम, 2026” के अंतर्गत कल डॉ. विजय माथुर, सलाहकार, संघ लोक सेवा आयोग, नई दिल्ली ने “भारतीय चित्रकला में काव्य, प्रेम एवं विरह” विषय पर ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडों में विकसित चित्रकला परंपराओं के माध्यम से काव्य, प्रेम, मिलन और विरह की भावपूर्ण अभिव्यक्ति पर प्रकाश डाला।
डॉ. विजय माथुर ने अपने व्याख्यान में बताया कि भारतीय चित्रकला केवल रंगों और रेखाओं की कला नहीं, बल्कि भारतीय समाज की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं भावनात्मक चेतना का सशक्त दृश्य माध्यम है। भारतीय सौंदर्यशास्त्र में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों पक्षों ने चित्रकला को समृद्ध किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय चित्रकला में प्रेम और विरह केवल मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं सौंदर्यपरक चेतना का भी महत्वपूर्ण आयाम है। भारतीय कलाकारों ने काव्य में निहित सूक्ष्म भावनाओं को रंग, रेखा और प्रतीकों के माध्यम से सजीव बनाकर चित्रकला को एक विशिष्ट दृश्य-काव्य का स्वरूप प्रदान किया।
उन्होंने अजंता की भित्ति-चित्रकला से लेकर मध्यकालीन चित्रकला तक मानवीय भावनाओं की विकसित होती अभिव्यक्ति का उल्लेख करते हुए जयदेव कृत ‘गीतगोविन्द’, राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंगों तथा राजस्थानी चित्रकला में रासिकप्रिया, बिहारी सतसई एवं कविप्रिया जैसे काव्यग्रंथों के प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. माथुर ने बारहमासा चित्रों में ऋतुओं और प्रकृति के माध्यम से व्यक्त विरह की अनुभूति, मुगल चित्रकला में साहित्यिक प्रेमाख्यानों तथा बसोहली, गुलेर, कांगड़ा एवं किशनगढ़ शैलियों में प्रेम और विरह की कोमल एवं काव्यात्मक अभिव्यक्ति को भारतीय कला परंपरा की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय चित्रकला में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं की सक्रिय सहभागी रही है।
भारतीय कला और साहित्य के संबंधों पर व्याख्यान की सराहना
इस अवसर पर विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने मुख्य वक्ता डॉ. विजय माथुर को पौधा एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर उनका हार्दिक स्वागत एवं समान किया। निदेशक महोदया ने उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय कला, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के परस्पर संबंधों पर उनका व्याख्यान प्रतिभागियों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणास्पद है। इन्होंने आगे कहा कि डॉ. विजय माथुर जी का व्याख्यान भारतीय चित्रकला और साहित्य के अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि काव्य, प्रेम और विरह की भावाभिव्यक्ति के माध्यम से भारतीय चित्रकला की समृद्ध सांस्कृतिक एवं सौंदर्यपरक परंपरा को समझने का यह एक उत्कृष्ट अवसर है तथा इस प्रकार के व्याख्यान प्रतिभागियों की भारतीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रति समझ को और अधिक व्यापक बनाते हैं।
कार्यक्रम के अंत में विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने मुख्य वक्ता डॉ. विजय माथुर तथा अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. नरेंद्र सिंह परमार, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, केन्द्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा, सहित सभागार में उपस्थित सभी प्रतिभागियों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
