पंडित सुनील पांडेय।
लखनऊ। 15 जून को अधिकमास (मलमास) में पड़ने वाली सोमवती अमावस्या का दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब अमावस्या सोमवार के दिन आती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। वहीं अधिकमास को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना गया है। ऐसे में अधिकमास और सोमवती अमावस्या का एक साथ पड़ना श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। इस अवसर पर देशभर के मंदिरों, तीर्थस्थलों और पवित्र नदी घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य, जप-तप और पितरों का तर्पण करने से विशेष पुण्यफल प्राप्त होता है। श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए तर्पण एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं। मान्यता है कि इस दिन किए गए धार्मिक कार्यों का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
सोमवती अमावस्या के अवसर पर विवाहित महिलाएं भी विशेष पूजा-अर्चना करती हैं। वे परिवार की सुख-समृद्धि, पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना से पीपल एवं बरगद के वृक्ष की पूजा कर उनकी परिक्रमा करती हैं। धार्मिक ग्रंथों में इन वृक्षों को अत्यंत पवित्र माना गया है और इनकी पूजा को शुभ फलदायी बताया गया है।
धार्मिक नगरी काशी में इस दिन का विशेष महत्व माना जाता है। यहां स्थित पौराणिक कुंडों, तालाबों और विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालु पूजा-अर्चना और पितृ तर्पण करते हैं। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार इन स्थलों पर श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए धार्मिक कर्मों का विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। पंचक्रोशी यात्रा के अंतिम पड़ाव कपिलधारा में भी इस दिन पितरों के तर्पण का विशेष विधान बताया गया है, जिसके कारण यहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या जुटती है।
अधिकमास भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण इस दिन विष्णु पूजा का भी विशेष महत्व है। इसके साथ ही भगवान शिव की आराधना, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने की परंपरा भी प्रचलित है। श्रद्धालु मंदिरों में पहुंचकर भगवान शिव और विष्णु की पूजा करते हैं तथा परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से भी सोमवती अमावस्या को स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, दान या आध्यात्मिक साधना के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि यह तिथि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
आस्था और श्रद्धा से जुड़े इस दुर्लभ महासंयोग के अवसर पर 15 जून को देशभर में विशेष धार्मिक आयोजन होंगे। श्रद्धालु स्नान, दान, पूजा और पितृ तर्पण के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करेंगे और अपने पूर्वजों तथा आराध्य देवों के प्रति श्रद्धा अर्पित करेंगे।
15 जून को मनाई जाएगी सोमवती अमावस्या
ज्येष्ठ (अधिक) मास की अमावस्या इस वर्ष 15 जून 2026, सोमवार को पड़ रही है। सोमवार के दिन अमावस्या होने के कारण इसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। सनातन परंपरा में इस तिथि को विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है। इस दिन व्रत, पूजा-अर्चना, दान-पुण्य और पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों को अत्यंत शुभ माना जाता है।
अमावस्या तिथि और पूजन का समय
वैदिक पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 14 जून की मध्यरात्रि 12:20 बजे प्रारंभ होगी और 15 जून की सुबह 8:24 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर सोमवती अमावस्या का व्रत और पूजन 15 जून को ही किया जाएगा।
शुभ योग बढ़ाएंगे दिन का महत्व
इस बार सोमवती अमावस्या पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं। मृगशिरा नक्षत्र के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ये योग पूजा-पाठ, जप, तप, ध्यान, दान और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए अत्यंत अनुकूल माने जाते हैं। ऐसे शुभ संयोगों में किए गए आध्यात्मिक कार्यों का फल विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
पितृ तर्पण का विशेष महत्व
अमावस्या तिथि को पितरों के स्मरण और तर्पण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु अपने पूर्वजों की शांति और कृपा प्राप्त करने के लिए तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य करते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार पितरों का सम्मान करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
तिल तर्पण और दीपदान की परंपरा
सोमवती अमावस्या पर जल में काले तिल मिलाकर तर्पण करने की परंपरा है। इसके साथ ही दीपदान भी किया जाता है। मान्यता है कि इन धार्मिक कर्मों से पितृ दोष की शांति होती है और जीवन में सकारात्मकता तथा शुभ फल की प्राप्ति होती है।
दान-पुण्य और साधना का श्रेष्ठ अवसर
इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, तिल, फल और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है। साथ ही भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा, मंत्र जप तथा ध्यान-साधना से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। श्रद्धालुओं के लिए यह दिन धर्म, सेवा और आत्मचिंतन का विशेष अवसर माना जाता है।
