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देवरिया का दीर्घेश्वर नाथ मंदिर: महाभारत काल का वह शिव मंदिर जहां आज भी आते हैं अश्वत्थामा

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चिरंजीवी अश्वत्थामा आज भी शिव आराधना करने आते हैं

संजय मिश्र।

देवरिया। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की सलेमपुर तहसील अंतर्गत मझौली राज की धरती पर छोटी गंडक नदी (हिरण्यवटी नदी) के तट,स्थित एक स्वयं-भू शिव मंदिर की गाथाएं द्वापर युग यानी महाभारत काल से जुड़ी हैं। जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित दीर्घेश्वर नाथ मंदिर देशभर में अपनी धार्मिक, पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय मान्यता है कि यह केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि चिरंजीवी अश्वत्थामा की तपस्थली है, जहां वे आज भी गुप्त रूप से शिव आराधना करने आते हैं।

द्वापर से जुड़ा इतिहास और नाम की उत्पत्ति

मंदिर के महंत जगन्नाथ दास पौराणिक प्रसंग सुनाते हैं। कहते हैं, गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा ने अपने पापों के प्रायश्चित और अमरता के लिए इसी स्थान पर भगवान शिव की सहस्त्रार्चन पूजा की थी। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान कृष्ण के शाप के कारण अश्वत्थामा आज भी मस्तक के घाव के साथ भटक रहे हैं। लोग दावा करते हैं कि जब वे अपनी पीड़ा की शांति के लिए भटकते हैं तो वातावरण में अजीब तरह की गंध फैल जाती है।

मंदिर परिसर की उत्तर दिशा में स्थित पार्वती सरोवर में खिलने वाले दुर्लभ सफेद कमल के फूल और यहीं का जल लेकर वे भोलेनाथ को प्रसन्न करते थे। शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दीर्घायु का वरदान दिया। इसी ‘दीर्घायु’ के वरदान के कारण शिव यहां दीर्घेश्वर नाथ कहलाए और मंदिर का नाम दीर्घेश्वर नाथ मंदिर पड़ा।

आज भी मिलते हैं अश्वत्थामा के आने के संकेत

यहां के पुजारी और स्थानीय लोग एक रहस्य साझा करते हैं। मान्यता है कि हर दिन तीसरे पहर, जब मंदिर में सन्नाटा होता है, अश्वत्थामा अदृश्य रूप में पूजन करने आते हैं। इसका प्रमाण सुबह मिलता है। जब ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर का कपाट खोला जाता है, तो शिवलिंग पर ताजे बेलपत्र, धतूरा और पार्वती सरोवर के सफेद कमल चढ़े मिलते हैं। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि यह अश्वत्थामा के नित्य पूजन का ही परिणाम है कि वे आज भी अमर हैं।

मझौली राज परिवार और संतों का योगदान

प्राचीन काल में यह मंदिर मझौली राज रियासत का हिस्सा था। इतिहास बताता है कि मझौली राज की महारानी श्याम सुंदरी कुंवरी ने सबसे पहले इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और इसे भव्य स्वरूप दिया। कालांतर में संत परंपरा ने इस धरोहर को संभाला। बांसुरी बाबा नगीना दास जी, टेंगरी दास जी, टांगुन दास जी और बंगाली बाबा जैसे संतों ने समय-समय पर मंदिर के रखरखाव और विकास के लिए अथक प्रयास किए।

आस्था का केंद्र: पार्वती सरोवर

मंदिर परिसर में स्थित पार्वती सरोवर इसकी पहचान है। इस सरोवर में खिलने वाले सफेद कमल केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि पौराणिक कथा का जीवंत हिस्सा हैं। मान्यता है कि भगवान शिव को सफेद कमल अति प्रिय हैं और अश्वत्थामा इन्हीं पुष्पों से उनका श्रृंगार करते थे। आज भी सावन में इन कमलों से विशेष पूजा होती है।

श्रद्धालुओं का सैलाब

सावन माह में यहां शिवभक्तों का मेला लगता है। दीर्घेश्वर नाथ मंदिर की विशेषता यह है कि हर सोमवार और शुक्रवार को भी देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां मत्था टेकने आते हैं। भक्त मानते हैं कि दीर्घेश्वर नाथ के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है, विशेषकर लंबी उम्र और आरोग्य का वरदान। प्राचीन शिव मंदिर के साथ ही परिसर में मां दुर्गा और काली माता का भी मंदिर है। साथ ही मंदिर परिसर में बत्तख आदि पक्षियों का झुंड भी देखने को मिलता है, जो यहां की शांति को और बढ़ाता है।

totaramnews1@gmail.com

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