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Sanatan Dharma Explained: सनातन धर्म का इतिहास, दर्शन और महत्व

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हृदयनारायण दीक्षित।


लखनऊ। तमिलनाडु की राजनीति में सनातन धर्म को समाप्त करने की मांग की गई है। उदयनिधि स्टालिन ने पिछले सप्ताह सदन में कहा है कि सनातन धर्म को समाप्त कर देना चाहिए। डीएमके के अन्य नेताओं ने भी सनातन परंपरा की निन्दा की है। जान पड़ता है कि तमिलनाडु की राजनीति में सनातन के विरुद्ध मानहानिकारक शब्द प्रयोग की बाढ़ आ गई। यह आश्चर्यजनक है कि ऐसे राजनेता सनातन का वास्तविक रूप नहीं जानते। ऐसे नेताओं को भारतीय दर्शन के मूल तत्वों का अध्ययन करना चाहिए और इसके लिए तमिलनाडु के ही निवासी डॉ. राधाकृष्णन के ग्रन्थ पढ़ने चाहिए।
सनातन धर्म किसी राजनीतिक दल के प्रस्ताव से अस्तित्व में नहीं आया है। यह सदा से है। विश्व इतिहास का कोई कालखण्ड सनातनविहीन नहीं रहा। यह रिलीजन नहीं है। मजहब भी नहीं है और पंथ भी नहीं है। सनातन अजर अमर धारणा है। सनातन का कभी जन्म नहीं होता। इसका कभी अवसान नहीं होता। सृष्टि की पहली किरण के साथ सत्य का जन्म हुआ। तब न रात्रि थी न दिन था। न आकाश था। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त के अनुसार तब केवल ‘वह‘ था। आखिरकार ‘वह‘ क्या था? ऋषि बताते हैं कि ‘वह‘ बिना वायु के स्वयं अपनी क्षमता के बल पर सांस ले रहा था। ‘वह‘ और कुछ नहीं सनातन ही था। प्रकृति प्रकट होती है। फिर व्यक्त से अव्यक्त होती है। सनातन तब भी रहता है। सनातन सदा से है। सदा रहता है। इसका न आदि है न अंत। सनातन का मूल अर्थ है जो सदा से है सदा रहता है।


दुनिया में अनेक आस्थाएं हैं। अनेक विचार हैं। अनेक सामाजिक व्यवस्थाएं हैं। लेकिन सनातन जैसा अनुभव विश्व इतिहास में कहीं नहीं मिलता। ऋग्वेद में सनातन व्यवस्था का नाम ऋत् है। ऋत् ब्रह्माण्ड की व्यवस्था का संविधान है। अस्तित्व का अणु परमाणु सुसंगत व्यवस्था में गतिशील है। सनातन से पृथक कुछ भी नहीं। अग्नि का गुण ताप है। वायु का गुण स्पर्श है। जल का गुण रस है। प्रकृति के सभी महाभूतों की गतिविधि ब्रह्माण्ड की व्यवस्था में बंधी हुई है। डॉ. राधाकृष्णन ने लिखा है, ”ईश्वर भी इस व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।”
प्रकृति प्रत्यक्ष सत्य है। उसकी शक्तियाँ भी प्रत्यक्ष सत्य हैं और नियम भी प्रत्यक्ष सत्य हैं। यही सत्य मानव समाज में भी दिखाई पड़ता है। तब प्रकृति की नियमबद्ध गतिविधि और मनुष्य का सदाचरण एक साथ विचारणीय हो जाते हैं। नियमों का पालन करना कर्तव्य है। यही धर्म भी है। ऋग्वेद (2.8.3) में कहते हैं, ‘‘अग्नि के नियमों का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता।‘‘ नदियाँ ऊपर से नीचे समुद्र की ओर बहती हैं। यह प्रकृति का नियम है और जल का धर्म। नदियाँ ऋतावरी कही गई हैं। ऋत अर्थात प्रकृति के संविधान की पालनकर्ता। सूर्य के लिए कहते हैं, ‘‘उसके नियम को इन्द्र, वरुण, रूद्र आदि देवता नहीं तोड़ सकते। (2.38.9) ऋषि वायु से कहते हैं, ‘‘नियमों के अनुसार चलने वाले मरुद्गण और सरस्वती हमारी स्तुतियाँ सुनें।‘‘ सभी दिव्य शक्तियाँ प्रकृति के नियमों का पालन करती हैं। नियम तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं है।


प्रकृति नियम आबद्ध है। यह अस्तित्व का नियम है। इसे ऋत कहते हैं। ऋत और धर्म पर्यायवाची हैं। वैदिककाल में मान्यता थी कि नियम पालन कराना वरुण देवता का कर्तव्य है। ऋग्वेद के अनुसार ‘‘यह काम भी वह धर्मानुसार ही करते हैं। सूर्य भी धर्मानुसार संसार को प्रकाश से भरते हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त, दिन के बाद रात, रात के बाद दिन सब नियमानुसार हैं। सारे नियम सत्य हैं। सनातन हैं।‘‘ ऋत, सत्य और धर्म एक जैसे हैं। भारतीय परम्परा में विष्णु बड़े देवता हैं। मान्यता है कि वे अवतार लेते हैं। लेकिन विष्णु के लिए भी धर्म पालन अनिवार्य है। ऋग्वेद के अनुसार ‘‘उन्होंने तीन पग चलकर ब्रह्माण्ड नाप दिया था।‘‘ यह कार्य आश्चर्यजनक था। ऋग्वेद के अनुसार उन्होंने यह कार्य धर्मानुसार पूरा किया। ग्रिफ्थ ने धर्म का अनुवाद ‘लॉज‘ (विधि) किया है।
सूर्य भी नियमों में बंधे हुए हैं। एक सुसंगत ब्रह्मांडीय व्यवस्था के अधीन उदय और अस्त होते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में कहते हैं, ‘‘जिससे सूर्य उदय अस्त होता है, उस धर्म को देवताओं ने बनाया है।‘‘ प्रकृति की शक्तियां नियम बंधन के अनुशासन में हंै। मनुष्यों को भी तद्नुसार धर्म-नियमों का पालन करना चाहिए। सनातन धर्म का विकास प्राकृतिक नियमों के विस्तार से हुआ। सनातन धर्म रिलीजन या मजहब नहीं है। रिलीजन और मजहब में एक ईश्वर और एक देवदूत की आस्था है। प्रत्येक मजहब या रिलीजन का एक पवित्र ग्रंथ है। उनके सत्य अंतिम हैं। उन पर कोई तर्क और जिज्ञासा नहीं हो सकती। लेकिन सनातन धर्म परम्परा में ईश्वर भी प्रश्न और जिज्ञासा के दायरे में आते हैं। धर्म-नियम धारण करना सभी तत्वों का धर्म है। बृहदारण्यक उपनिषद में कहते हैं, ‘‘धर्म सभी भूतों का मधु-सार है और सभी भूत धर्म का मधु-सार हैं।‘‘ यह सनातन है।
तमिलनाडु के निवासी कम्बन ने रामकथा लिखी और सनातन धर्म को प्रतिष्ठा दी। इसी राज्य के निवासी राजगोपालाचारी ने भारतीय संस्कृति के लिए अविस्मरणीय काम किया।

उन्होंने सभी वर्णों के मंदिर प्रवेश की मुहिम चलाई। तमिलनाडु के ही विश्वविख्यात दार्शनिक डॉ० राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को विश्वव्यापी बनाया। उन्होंने रूस यात्रा में स्टालिन को समझाया कि रक्तपात बुरा है। इसी भेंट में स्टालिन ने उनसे पूछा कि भारत की लोकप्रिय भाषा कौन सी है? राधाकृष्णन ने हिन्दी बताया। भारत के राष्ट्रपति रहे परमाणु वैज्ञानिक ए० पी० जे० अब्दुल कलाम भी तमिलनाडु के थे। उन्होंने भारत की प्रतिष्ठा सारी दुनिया में पहुँचाई। अद्वैत दर्शन में भक्ति भाव भरने वाले रामानुजाचार्य भी यहीं के थे। आश्चर्य है कि स्टालिन और उनके सहयोगियों के वक्तव्यों ने ऐसे तमाम महानुभावों की सांस्कृतिक परम्परा और योगदान को भी आहत किया है। सनातन धर्म में आज्ञासूचक संहिता नहीं है। 6 प्राचीन दर्शन व लोकायत जैसे नास्तिक दर्शन भी सनातन धर्म का हिस्सा हैं। यहाँ सुसंगत दार्शनिक दृष्टिकोण है। सनातन धर्म किसी देवदूत की उद्घोषणा नहीं है। स्टालिन के अपने निहित स्वार्थ हो सकते हैं। बेशक उनके स्वार्थ हैं। वे सनातन धर्म का खात्मा चाहते हैं। लेकिन वे स्वयं जानते हैं कि सनातन की समाप्ति असंभव काम है। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी होती है। सनातन धर्म अजन्मा है। इसका न कोई आदि है न कोई अंत।

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