डेस्क। हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में दस महाविद्याओं का विशेष महत्व बताया गया है, जिनमें मां छिन्नमस्ता को अत्यंत उग्र, शक्तिशाली और रहस्यमयी देवी माना जाता है। उनका स्वरूप जितना अद्भुत और विस्मयकारी है, उतनी ही गहरी उनके प्रकट होने की कथा भी है, जो त्याग, करुणा और आत्मबल का संदेश देती है। हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मां छिन्नमस्ता जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है।
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 29 अप्रैल, बुधवार की शाम 7:51 बजे से प्रारंभ होकर 30 अप्रैल, गुरुवार की रात 9:12 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर इस वर्ष छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां छिन्नमस्ता देवी पार्वती का उग्र रूप हैं और दस महाविद्याओं में छठा स्थान रखती हैं। मार्कंडेय पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, देवी चंडी ने जब राक्षसों का संहार किया, तब उनकी दो योगिनियां—जया और विजया—रक्त की प्यास से व्याकुल थीं। उनकी तृप्ति के लिए देवी ने स्वयं अपना सिर काटकर उन्हें रक्त पान कराया। यह प्रसंग त्याग और करुणा का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।
मां छिन्नमस्ता की उपासना विशेष रूप से उन साधकों द्वारा की जाती है जो आध्यात्मिक उन्नति, निर्भयता और जीवन की बाधाओं को पार करना चाहते हैं। उनका स्वरूप अहंकार के नाश, आत्मसंयम और आंतरिक शक्ति का प्रतीक है।
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के दिन विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने की मान्यता है। कहा जाता है कि उनकी आराधना से भय दूर होता है, नकारात्मक शक्तियों से रक्षा मिलती है और मानसिक संतुलन स्थापित होता है। साथ ही, व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अनियंत्रित इच्छाओं पर काबू पा सकता है। मां छिन्नमस्ता का संदेश स्पष्ट है—सच्ची शक्ति आत्मनियंत्रण और त्याग में निहित होती है, जो जीवन को संतुलन, शांति और स्थिरता प्रदान करती है।
