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तुम बहुत बोल चुके, अब मैं बोलूंगी।

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हृदयनारायण दीक्षित।


बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण आ गया है। केन्द्रीय मंत्रीपरिषद ने इसे पारित कर दिया है। महिला आरक्षण सामाजिक समता का ऐतिहासिक दस्तावेज है। इससे अथर्ववेद के एक मंत्र की ध्वनि सुनाई पड़ रही है। इस मंत्र में एक स्त्री कहती है, ”तुम बहुत बोल चुके। अब मैं बोलूंगी।” भारत में प्राचीन काल से ही स्त्री सम्मान रहा है। महिलाओं की खराब स्थिति का प्रचार करने वाले मिथ्या आरोप लगाते रहे हैं।
भारतीय समाज में स्त्रियां पुरुष के बराबर सम्मानीय रही हैं। वैदिक काल में भी स्त्री सम्मान था। वैदिक काल की एक प्रतिष्ठित महिला मुदग्लानी रथ पर चढ़कर युद्ध में हिस्सा लेती थीं। युद्ध में उनके वस्त्रों का संचालन वायु देव ने किया था। ऋग्वेद के अनुसार युद्ध में विपशला का पैर कट गया। अश्वनी देवों ने उसे धातु का पैर लगा दिया था। पति और पत्नी को मिलाकर दंपत्ति बनता है। दंपत्ति में नारी की प्रतिष्ठा है। ऋग्वेद में अनेक सूक्तों में स्त्री सम्मान के तत्व है। सृष्टि की उत्पत्ति जल से होने का तथ्य चाल्र्स डार्विन ने भी स्वीकार किया है। जल माता का विचार डारविन के बहुत पहले वैदिक काल में ही पुष्ट हो चुका था। ऋग्वेद में ‘आपः मातरम‘-जलमाताओं को नमस्कार किया गया है।
ऋग्वेद में अदिति नाम की एक महादेवी हैं। कहा गया है, ‘‘इस अस्तित्व के सभी तत्व अदिति हैं। अब तक जो कुछ हो गया है और जो कुछ भविष्य में होगा वह सब अदिति है।‘‘ ऋग्वेद का सूक्त पठनीय है। अदितिः द्यौः अदितिः अन्तरिक्षं अदितिः माता सः पिता सः पुत्रः अदितिः विश्वेदेवाः अदितिः पंचजनाः अदितिः जातम जनित्वम-द्युलोक अदिति है, अंतरिक्ष भी अदिति है, माता-पिता-पुत्र सब अदिति हैं, सारे देव अदिति हैं, जो पंचजन सप्तसिन्धु में निवास करते हैं, वह सब अदिति हैं। जो कुछ उत्पन्न हुआ है और जो कुछ आगे उत्पन्न होगा, वह सब अदिति है। (ऋग्वेद 1.89.10) यूनानी देवतंत्र में अदिति के समान गूढ़ दार्शनिक अर्थ रखने वाली कोई देवी नहीं है।
विवाहित होना सम्मानीय था। स्मृतियों में दीर्घकाल तक अविवाहित बने रहने की आलोचना की गई है। विवाह नाम की संस्था का विकास धीरे-धीरे हुआ है। ऋग्वेद के रचनाकाल तक विवाह संस्था का समुचित विकास हो रहा था। स्त्री दासी नहीं है। ऋग्वेद के एक सुंदर मंत्र में नववधू को शुभकामनाएं देते हुए कहा गया है कि, ‘‘यह नववधू दीर्घकाल तक जिए। दीर्घकाल तक काम करे। ससुर और सभी परिजनों पर शासन करे।‘‘ यह भारतीय संस्कृति का प्राचीन तत्व है।
भारत में नारी की स्थिति सभी कालों में सम्माननीय रही है। पूर्वजों ने स्त्री को समाज का संरक्षक माना है। वैदिक काल में महिलाएं मंत्रदृष्टा ऋषि भी थीं। बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार राजा जनक ने विद्वानों की सभा बुलाई थी। अनेक विद्वान इस गोष्ठी में सम्मिलित थे। विद्वानों की सभा में गार्गी ने याज्ञवल्क्य से सीधे सवाल पूछे थे। पूछा था कि, ‘‘यह संपूर्ण अस्तित्व किस तत्व पर टिका हुआ है?‘‘, ‘‘सृष्टि किस आधार पर खड़ी है।‘‘ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, ‘‘जल पर।‘‘ गार्गी ने उत्तर के बाद पूछा, ‘‘जल किसमें आधारित हैं?‘‘ फिर पूछा गया कि, ‘‘इस अस्तित्व को कौन देवता आधार देते हैं?‘‘ गार्गी ने पूछा, ‘‘इस विराट अस्तित्व का आधार क्या है?‘‘ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया ब्रह्म ही सबको धारण करता है। ब्रह्म ही सर्वोच्च हैं। गार्गी ने अगला प्रश्न पूछा कि, ‘‘ब्रह्म किस पर आधारित हैं। याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘‘ब्रह्म सर्वोच्च हैं। ब्रह्म ही भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। ब्रह्म का कारण ब्रह्म हैं। ब्रह्म असीम हैं। अनंत हैं।
गार्गी की प्रतिभा अद्भुत थी। राम सीता की जोड़ी में सीता और राम दोनों की विशिष्टता देखी जाती है। कोई बड़ा नहीं। कोई छोटा नहीं। सीता जैसा चरित्र दुनिया के किसी भी देश में नहीं मिलता। शिव पार्वती में पार्वती प्रथमा हैं और वह सभी अवसरों पर शंकर जी से विभिन्न विषयों पर गहन प्रश्न पूछा करती हैं। कैकई और दशरथ के कथानक में कैकई विचारणीय हैं। भारतीय परंपरा व साहित्य में सर्वत्र स्त्री सम्मान की गूंज है। यत्र नारी अस्तु पूजते रमंते ततदेवता-जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता रहते हैं। नारी माता हैं। अनेक प्रतीकों में स्त्री को माँ कहा गया है। माता से बढ़कर दूसरा कोई प्रतीक नहीं है। यहां भारत को भी भारत माता कहा गया है। अथर्ववेद के भूमि सूक्त में पृथ्वी को माँ बताया गया है। अधिकांश नदियों को भी हम माता ही कहते हैं। वैदिक काल में यज्ञ की अतिरिक्त प्रतिष्ठा रही है। यज्ञ विधान के अनुसार पूजा में पत्नी की उपस्थिति अनिवार्य है। अथर्ववेद के एक सुंदर मंत्र में ऋषि पत्नी से कहते हैं, ‘‘तुम ऋक हो। मैं साम (गान) हूं। मैं अंतरिक्ष हूं। तुम पृथ्वी हो।‘‘
दुनिया की प्रत्येक सभ्यता में देवतंत्र है। देवता हैं, देवियां हैं। सामाजिक विकास के क्रम में मिस्र ने प्रकृति की शक्तियों को देवता जाना और माना था। जिस समाज में देवियां होंगी उस समाज में स्त्रियों का सम्मान होगा। देवतंत्र मनुष्य के सपनों का ही विस्तार है। देवियों का आदर स्त्रियों का आदर है, इसी तरह स्त्रियों का आदर देवियों का आदर है। भारत में वैदिक काल का देवतंत्र ध्यान देने योग्य है। भारत में अनेक देवियां हैं। ऋग्वेद में वाणी की अराधना की गई है। देवियों की उपासना करने वाले समाज में स्त्री सम्मान होगा ही। इसी तरह का एक शब्द है रोदसी। रोदसी में माता पृथ्वी और पिता आकाश को संयुक्त रूप में याद किया गया है। (ऋग्वेद 2.11.15) चाहे सोम रस की बात हो या अन्य सभी अनुशासनों में। माता-पिता की जोड़ी में मां प्रथमा हैं।
वैदिक काल में अनेक स्त्रियां वेद मंत्रों की रचयिता या दृष्टा ऋषि भी रही हैं। इनमें लोमसा, लोपामुद्रा, यमी, श्रद्धा, ब्रह्मवादिनी जुहू, सूर्या, इंद्राणी, कच्छीवान की पुत्री घोषा आदि स्त्रियों की प्रतिष्ठा किसी भी विद्वान से कम नहीं थी। पूर्वजों ने मातृ शक्ति को पुरुष जैसा सम्मान दिया है। ऋग्वेद के एक सूक्त में पौलोमी सची द्वारा व्यक्त उद्गार देखने योग्य हैं। वे कहती हैं, ”मैं ज्ञानवती हूं। मैं मूर्धन्य हूं। मैं तेजस्वी वक्ता हूं। मैं शत्रुओं का विनाश करती हूं। पति मेरे अनुकूल व्यवहार करते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में गंधर्व ग्रहीता कुमारी का विवरण है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार मैत्रेयी ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नी थीं। उनकी रुचि ब्रह्म विद्या में थी। याज्ञवल्क्य ने सन्यासी होने का निर्णय लिया। दोनों पत्नियों को बुलाया और बताया कि हमारी संपदा दोनों पत्नियां मिलकर बांट लो। इस पर मैत्रेयी ने कहा कि, ”मुझे धन संपदा नहीं चाहिए। आपको जो ज्ञान प्राप्त हो वही मुझे दीजिए।” कृतार्षिनी ने मीमांसा दर्शन पर ग्रंथ लिखा था।
वैदिक काल में शिक्षा की उत्तम व्यवस्था थी। इनमें तमाम महिलाएं आचार्य थीं। बच्चों को पढ़ाती थीं। पाणिनी की व्याकरण के अनुसार उपाध्याय की पत्नी को उपाध्यायानी कहा गया है और जो स्त्री स्वयं अध्ययन का कार्य करे उसके लिए उपाध्याय शब्द ठीक होगा। वैदिक काल में संपत्ति पर स्त्रियों का भी अधिकार था। महिलाएं घर की प्रधान थीं।

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