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“आदित्यनाथ” योगी या राजनेता

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कामेश त्रिपाठी।

योगी आदित्यनाथ वैसे तो किसी परिचय के मोहताज नहीं है फिर भी यहां मैं अपनी सोच और विचारधारा के अनुसार उनका एक परिचय समाज के समक्ष रखने का प्रयास करता हूं। और जो परिचय यहां मैं देने जा रहा हूं यह मेरी निजी धारणा है इस पर विश्वास करना या ना करना जनता की अपनी सोच और विवेक पर निर्भर करता है। कुछ ऐसे तथ्य और स्थितियां मुझे देखने और समझने को मिली जिसके कारण मैं योगी जी के परिचय में लिखने के प्रति प्रेरित हुआ हूं और अपनी इसी सोच को समाज के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
मैं जब विपक्षी दलों और अन्य राजनेताओं के मुंह से बार-बार योगी जी पर यह टिप्पणी करते हुए सुना की एक योगी को मठ में होना चाहिए ना की राजनीति में। इस सवाल पर मैं जब विचार किया कि आखिर क्या कारण हो सकता है कि एक जोगी जो कि धर्म के संरक्षण का पदभार संभाल रहा है तो उसे राजनीति में उतरना पड़ा होगा। काफी सोच विचार के बाद यह विचार मन में आया की एक बालक जो कि पहले योगी बनता है फिर राजनीति करता है जबकि प्रायः देखा जाता है कि इंसान सब कुछ त्याग कर राजनीति और गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर ही योगी बनता है परंतु यहां धारा कुछ उल्टी क्यों है आखिर एक ऐसा बालक जिसके मन में पहले वैराग्य उत्पन्न होता है और फिर वह राजनीति में पदार्पण करता है तब मेरे विचार में पुनर्जन्म की बात कौंधने लगती है। हमारे शास्त्रों में यह मान्यता है कि इंसान अपने कर्मों और रासायनिक गुणों के अधूरे पन को पूर्ण करने के लिए ही पुनर्जन्म प्राप्त करता है, अर्थात कोई ऐसी अधूरी अवस्था उसकी पूर्व जन्म में रह जाती है जिसकी पूर्ति हेतु उसका पुनर्जन्म होता है यही बात मन में आने पर मैंने इतिहास पर विचार किया तो एक ऐसे सम्राट का नाम आया जो की एक अत्यंत धर्मनिष्ट सम्राट थे उनका नाम “राजा भर्तृहरि” था। उज्जैन के राजा भर्तृहरि का नाम आता है कि उन्होंने अपनी पत्नी के बेवफाई के कारण ही राज त्याग कर गुरु गोरखनाथ के शिष्य हो गए और अपना राज्य अपने भाई विक्रमादित्य को सौंप कर योग साधना में लीन हो गए। और इस घटना का अध्ययन करने पर ही मेरे मन में ये भाव आया कि शायद माननीय योगी आदित्यनाथ जी ही सम्राट भर्तृहरि का पुनर्जन्म है यही कारण है कि योगी जी पहले वैराग्य की तरफ बढ़े और फिर राजनीति की तरफ।
क्योंकि राजनीति का जो अधूरा रसायन उनका पूर्ण नहीं हुआ था वह पूर्ण करने के लिए ही उनका शासक के रूप में पुनः प्रदेश की जनता की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ है और जिस दिन इनका यह राजा का रासायनिक गुण पूर्ण होगा उस दिन पुनः अपने आप ही राजनीति से संन्यास ले लेंगे।
योगी जी की एक नीति भी ऐसी देखने को मिली जो कि इस बात की पुष्टि करती दिखाई देती है जब योगी पहली बार मुख्यमंत्री बने तो सबसे पहले उन्होंने “एंटी रोमियो” कानून लगाया और इतिहास से पता चलता है कि राजा भर्तृहरि भी अपनी पत्नी पिंगला देवी के बेवफाई के कारण ही दुखी होकर गुरु गोरखनाथ जी की शरण में गए और संसार को मिथ्या मानकर जोगी बन गए थे। कहीं ना कहीं वह पिछले जन्म का उनका बैरागी मन इस झूठे प्रेम प्रसंग के खिलाफ आज भी खड़ा है । खैर जो भी कारण हो परंतु मेरा यह मानना है कि राजा भर्तृहरि ही अपने पूर्व जन्म के अधूरे कार्यों को पूर्ण करने के लिए ही योगी जी के रूप में पुनः अवतरित हुए हैं। दूसरा एक और भी कारण है कि राजा भर्तृहरि भी गुरु गोरख नाथ के शिष्य के रूप में नाथ संप्रदाय के ही योगी बने थे और आदित्यनाथ भी नाथ संप्रदाय की उसी परिपाटी में योगी बने। योगी जी का साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव जितना देखने को मिलता है उससे भी राजा भरथरी की याद आती है क्योंकि राजा भर्तृहरि एक धार्मिक कर्तव्यनिष्ट और साहित्य प्रेमी शासक थे उनके तीन रचना जिनका नाम (नीति शतक श्रृंगार सतक और वैराग्य शतक) इस बात के प्रमाण हैं।
योगी जी के बारे में कही गई यह बातें मेरी निजी विचारधारा है और मेरे पुनर्जन्म सिद्धांत के प्रति विश्वास का आधार है यदि वास्तव में पुनर्जन्म होता है और अधूरे कर्मों को पूर्ण करने के लिए ही होता है तो निश्चित ही मेरी विचारधारा में कुछ सच्चाई अवश्य होगी इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि योगी आदित्यनाथ एक योगी भी हैं और एक कुशल शासक भी हैं वैसे भी हमारे पुराणों में धर्मनिष्ठ राजाओं की परंपरा हमेशा से रही है इसका सबसे बड़ा उदाहरण मिथिला नरेश “विदेहराज जनक” जी हैं, जिन्हें राजा होते हुए भी किसी बात का अहम नहीं था और पूर्ण बैरागी राजा थे। भारतीय परंपरा ही राजसत्ता से वैराग्य की तरफ और वैराग्य से समाज कल्याण की तरफ जाने की यात्रा रही है भारतीय संस्कृत में राजसत्ता और योग को एक दूसरे से भिन्न नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा गया है। हमारे देश की परंपरा में एक धर्मनिष्ठ शासन की परिकल्पना रही है, अर्थात जो व्यक्ति जितना धार्मिक होगा वह उतना ही कर्तव्यनिष्ठ शासक बन सकेगा और जनता के प्रति उदार,कर्तव्य परायण और न्याय प्रिय रहेगा

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