लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के ऑरल पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने 23–24 मार्च 2026 को “An Approach to Diagnose Rare Oral Lesions: From Confusion to Clarity” शीर्षक से दो दिवसीय राष्ट्रीय कंटिन्युइंग डेंटल एजुकेशन (CDE) कार्यक्रम का सफल आयोजन किया। यह कार्यक्रम भारतीय ऑरल और मैक्सिलोफेशियल पैथोलॉजिस्ट एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित किया गया। इस वर्चुअल कार्यक्रम में देशभर के विशेषज्ञों ने दुर्लभ मौखिक रोगों के निदान में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन कुलपति प्रो. (डॉ.) सोनिया नित्यानंद के मार्गदर्शन में हुआ, वहीं डीन प्रो. (डॉ.) जी.के. सिंह और प्रो. (डॉ.) शलीन चंद्रा की सक्रिय सहभागिता और नेतृत्व से इसे सफलता मिली। कार्यक्रम में लगभग 400 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया, जो इस विषय में बढ़ते शैक्षणिक रुचि का प्रमाण है।
सत्र:
- पहले दिन डॉ. नरेंद्र नाथ सिंह ने दुर्लभ ओडोंटोजेनिक ट्यूमर के निदान पर चर्चा की।
- डॉ. केया सरकार ने दुर्लभ ओडोंटोजेनिक सिस्ट की पहचान और भिन्न विशेषताओं पर जोर दिया।
- डॉ. आदित्य बी. उर्स ने दुर्लभ हड्डी की रोगों के लिए उन्नत इमेजिंग और क्लिनिको-पैथोलॉजिकल कोरिलेशन की महत्ता बताई।
- डॉ. सोनाली शाह ने असामान्य हिस्टोलॉजिकल वेरिएंट और तंबाकू के दुष्प्रभावों पर प्रकाश डाला।
- डॉ. माला काम्बोज ने दुर्लभ सैलिवरी ग्लैंड रोगों में इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री की भूमिका पर चर्चा की।
दूसरे दिन डॉ. टबिता जॉय ने दुर्लभ सॉफ्ट टिशू ट्यूमर पर पैटर्न-बेस्ड डायग्नोस्टिक दृष्टिकोण पेश किया, जबकि डॉ. सुष्मिता सक्सेना ने मौखिक और पेरिओरल क्षेत्र में दुर्लभ त्वचा रोगों में अंतरविषयक सहयोग की आवश्यकता बताई। डॉ. सुहैल लातू ने “Decoding the Uncommon” सत्र में वास्तविक जीवन की निदान चुनौतियों और आलोचनात्मक सोच को साझा किया।कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण डॉ. शलीन चंद्रा का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर सत्र रहा, जिसमें उन्होंने निदान सटीकता बढ़ाने और जटिल मामलों में त्वरित निर्णय लेने में AI की भूमिका पर जोर दिया। अंतिम सत्र में डॉ. रुचि नागपाल ने मौखिक कैंसर की समय पर पहचान और जागरूकता, स्क्रीनिंग और तंबाकू निषेध के महत्व को उजागर किया।

कार्यक्रम में पोस्टग्रेजुएट छात्रों के लिए क्विज़, निबंध लेखन, स्लोगन प्रस्तुति, साबुन शिल्प, ई-पोस्टर और रील निर्माण जैसी प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की गईं। इस CDE कार्यक्रम ने ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एक मूल्यवान मंच प्रदान किया और दुर्लभ मौखिक रोगों के निदान में बहुविषयक दृष्टिकोण के महत्व को उजागर करते हुए रोगियों की बेहतर देखभाल और उपचार परिणामों में सुधार की दिशा में योगदान दिया।
