डेस्क। सरकार की सतत औद्योगिक विकास और चक्रीय अर्थव्यवस्था कार्य प्रणालियों को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता के अनुरूप विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) ने पर्यावरण के अनुकूल, अल्ट्रा-लो कार्बन वॉल क्लैडिंग आवरण सामग्री के व्यावसायीकरण में सहायता के लिए कार्बन क्राफ्ट डिजाइन प्राइवेट लिमिटेड के साथ वित्तीय सहायता के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
“पर्यावरण के अनुकूल अल्ट्रा लो कार्बन फुटप्रिंट वॉल क्लैडिंग का व्यावसायीकरण” नामक इस परियोजना में स्वदेशी तकनीक का उपयोग करके विकसित जियोपॉलिमर-आधारित टाइलों के लिए एक अत्याधुनिक विनिर्माण सुविधा की स्थापना शामिल है। कार्बनक्राफ्ट एक डिज़ाइन और सामग्री नवाचार स्टार्टअप है जो निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट का उपयोग करके अति-निम्न कार्बन उत्सर्जन वाले, चक्रीय अर्थव्यवस्था पर आधारित भवन निर्माण सामग्री विकसित करने पर केंद्रित है। कंपनी की स्वामित्व वाली तकनीक औद्योगिक उप-उत्पादों को टाइल, एग्रीगेट और ईंट जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों में स्थायी रूप से समाहित करने में सक्षम बनाती है। प्रस्तावित जियोपॉलिमर वॉल क्लैडिंग दीर्घकालिक, उच्च-प्रदर्शन वाली टाइलें हैं जो पुनर्चक्रित क्वार्ट्ज अपशिष्ट और बहु-श्रेणी क्वार्ट्ज रेत का उपयोग करके विशेष प्रसंस्करण और मिश्रण तकनीकों के माध्यम से निर्मित की जाती हैं, जिससे ऊर्जा-गहन भट्टी में पकाने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
इस अवसर पर टीडीबी के सचिव श्री राजेश कुमार पाठक ने कहा कि भारत के जलवायु लक्ष्यों और शुद्ध शून्य महत्वाकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए स्थायी निर्माण सामग्री की ओर बढ़ना अत्यंत महत्वपूर्ण है। कार्बन क्राफ्ट जैसे नवोन्मेषी स्टार्टअप्स का समर्थन करके, टीडीबी स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण को सक्षम बना रहा है जो कार्बन फुटप्रिंट को कम करती हैं, अपशिष्ट के सदुपयोग को बढ़ावा देती हैं और भारत के हरित विनिर्माण इकोसिस्टम को मजबूत करती हैं। कार्बन क्राफ्ट डिजाइन प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापकों ने टीडीबी के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस सहायता से विनिर्माण क्षमताओं के विस्तार में तेजी आएगी और स्थायी निर्माण सामग्री के लिए बाजार पहुंच बढ़ेगी। कंपनी ने चक्रीय अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत के सिद्धांतों के अनुरूप कम कार्बन उत्सर्जन वाले निर्माण समाधानों को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया। इस परियोजना से विशेष वास्तुशिल्प आवरण सामग्री के आयात प्रतिस्थापन में योगदान मिलने, औद्योगिक कचरे को कम करने और देश भर में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार निर्माण कार्य प्रणालियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जिससे भारत के सतत और आत्मनिर्भर विकास के दृष्टिकोण को बल मिलेगा।
