हिंदी कविता | बातों, वादों और जज़्बातों का मतलब
वीरेंद्र कुमार मिश्र “विरही”
अब लोग कहां पहले जैसे,जिनकी बातों का मतलब था।
भावना हृदय में होती थी और जज्बातों का मतलब था।
अपनी जुबान के पीछे वे सबकुछ का दांव लगाते थे।
संकल्प सुरक्षित रखने को,वे घास की रोटी खाते थे।
बढ़ गए कदम जिस ओर चले,उठते हाथों का मतलब था।……..
महलों का मोह त्याग डाला,कुटिया में कष्ट काटते थे।
आधी रोटी में संतुष्टि,आधी जो बची बांटते थे।
काली संत्रास भरी भी थीं,पर उन रातों का मतलब था ………।
कह गए अगर कुछ सपने में तो उसका मान रखाते थे।
दे दिया राज्य सम्पूर्ण और घर डोम सहर्ष बिकाते थे।
मरकर भी मोल चुकाते थे,रिश्ते-नातों का मतलब था ……..।
अब तो जब चाहा जो बोला,फिर गए जुबां से किए नहीं।
धन-बैभव,मान,प्रतिष्ठा भी लेकर बदले कुछ दिए नहीं।
आंधी-तूफान झेलते थे,झंझावातों का मतलब था ………।
