KGMU लखनऊ के शोध ने दिखाई नई दिशा, नेत्रविहीन मरीजों के लिए उम्मीद की किरण
लखनऊ। चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी सफलता सामने आई है। केजीएमयू (King George’s Medical University) के शोध में 3D प्रिंटिंग तकनीक और AI का उपयोग कर कस्टमाइज्ड PLA ऑर्बिटल इम्प्लांट तैयार किया गया है, जो रेटिनोब्लास्टोमा जैसे रोगों से पीड़ित बच्चों के लिए नई उम्मीद बन गया है। जिन बच्चों की आंख निकालनी पड़ी थी, उनके लिए यह इम्प्लांट कॉस्मेटिक सुधार, सुरक्षित फिटिंग और सस्ते इलाज का समाधान प्रस्तुत करता है।
शोध के अनुसार, 3D प्रिंटेड इम्प्लांट न केवल सुरक्षित है, बल्कि कन्वेंशनल इम्प्लांट की तुलना में लागत भी बहुत कम है — केवल 10 रुपये से भी कम। इस तकनीक से फिटिंग बेहतर होती है और जटिलताओं का खतरा भी कम हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नवाचार विशेष रूप से भारत जैसे देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बना सकता है।
यह शोध KGMU के नेत्र रोग विभाग की एम.एस. छात्रा डॉ. शिवानी सुरेश द्वारा किया गया है। उनके मार्गदर्शक प्रो. संजीव कुमार गुप्ता रहे, जबकि सह-मार्गदर्शकों में डॉ. अरुण कुमार शर्मा, प्रो. सिद्धार्थ अग्रवाल और डॉ. विशाल कटियार ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस कार्य को विभागाध्यक्ष प्रो. अपजित कौर के नेतृत्व में सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।
ऑर्बिटल इम्प्लांट क्या है?
जब आईबॉल किसी कारणवश नहीं होती (जैसे ट्रॉमा या सर्जरी), तो आंख की कैविटी में हड्डी वाले ऑर्बिट में इम्प्लांट लगाया जाता है। यह सामान्यतः ऐक्रेलिक प्लास्टिक या सिलिकॉन मटीरियल से बना होता है और बाजार में इसकी कीमत 1,500 से 2,500 रुपये तक होती है। 3D प्रिंटेड PLA इम्प्लांट इस प्रक्रिया को सस्ता, सुरक्षित और प्रभावी बनाता है।
