रहषु भगत की कथा से जुड़ा है इतिहास
थावे, गोपालगंज (बिहार) | संजय मिश्र
गोपालगंज। आइए, आपको लेकर चलते हैं बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित मां थावे भवानी के पावन दरबार में। देवरिया और कुशीनगर जिले से सटे इस प्रसिद्ध धाम में श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। घंटियों की गूंज, शंखनाद और “जय माता दी” के जयघोष के बीच मां थावे भवानी का मंदिर वर्षभर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहता है।
विशेष रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि के अवसर पर मंदिर के कपाट लगातार खुले रहते हैं, जिससे श्रद्धालु किसी भी समय मां के दर्शन कर सकते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और नेपाल तक के भक्तों के लिए थावे धाम एक प्रमुख धार्मिक स्थल माना जाता है। उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन परंपराओं और लोककथाओं के कारण देशभर में विशेष पहचान रखता है।
हथुआ राज की कुलदेवी हैं मां थावे भवानी
मां थावे भवानी को हथुआ राज परिवार की कुलदेवी माना जाता है। सदियों पुरानी परंपराएं आज भी यहां पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती हैं। विशेष अवसरों पर हथुआ राज परिवार की ओर से महानिशा पूजा और महाभोग का आयोजन किया जाता है। मंदिर की पूजा व्यवस्था और पुजारियों की परंपरा भी लंबे समय से राजपरिवार के संरक्षण से जुड़ी रही है। यही वजह है कि थावे धाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है।

रहषु भगत की भक्ति से जुड़ी है थावे धाम की पहचान
थावे भवानी मंदिर की सबसे बड़ी पहचान रहषु भगत की अद्भुत भक्ति से जुड़ी लोककथा है। यह कथा आज भी श्रद्धालुओं के बीच आस्था और विश्वास के साथ सुनाई जाती है। लोकमान्यता के अनुसार, हथुआ के राजा मनन सिंह स्वयं को मां दुर्गा का अनन्य भक्त मानते थे। उसी समय उनका राज्य भीषण अकाल की मार झेल रहा था। थावे गांव में रहषु नाम के एक निर्धन भक्त रहते थे। कहा जाता है कि वे दिन में घास काटते थे और रात में बाघों को जोतकर दौनी करते थे।
मान्यता है कि मां भवानी की कृपा से उनके द्वारा काटी गई घास अन्न में बदल जाती थी, जिससे जरूरतमंदों और भूखे लोगों का पेट भरता था। जब राजा को इस चमत्कार की जानकारी मिली तो उन्होंने रहषु भगत की परीक्षा लेने के लिए मां भवानी को प्रत्यक्ष बुलाने का आदेश दिया। रहषु भगत ने राजा को समझाया कि देवी का साक्षात प्रकट होना किसी बड़े अनिष्ट का संकेत हो सकता है, लेकिन राजा अपनी जिद पर अड़े रहे।

लोककथा के अनुसार, मां भवानी कामाख्या से थावे पहुंचीं और रहषु भगत को अपने कंगनयुक्त दिव्य हाथ का दर्शन कराया। उसी क्षण रहषु भगत का मस्तक फट गया और राजा मनन सिंह का महल धराशायी हो गया, जिसमें राजा की भी मृत्यु हो गई। यह कथा आज भी थावे धाम की लोकआस्था का अभिन्न हिस्सा है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रद्धालुओं के बीच जीवंत बनी हुई है।
पहले रहषु भगत, फिर मां भवानी के दर्शन
थावे भवानी मंदिर से कुछ दूरी पर रहषु भगत का मंदिर स्थित है। स्थानीय मान्यता है कि रहषु भगत के दर्शन किए बिना मां सिंहासिनी की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। इसी श्रद्धा के कारण अधिकांश श्रद्धालु पहले रहषु भगत को नमन करते हैं और उसके बाद मां थावे भवानी के दरबार में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। भक्त प्रेम और श्रद्धा से मां को “रहषु भवानी” के नाम से भी संबोधित करते हैं।

सड़क और रेल मार्ग से पहुंचना आसान
गोपालगंज जिला मुख्यालय से थावे धाम तक पहुंचने के लिए टैक्सी और बस की सुविधा आसानी से उपलब्ध है। राष्ट्रीय राजमार्ग-531 से जुड़ा यह मंदिर सड़क मार्ग से अच्छी तरह पहुंच योग्य है। निकटतम रेलवे स्टेशन थावे जंक्शन है, जहां से मंदिर कुछ ही दूरी पर स्थित है। मंदिर परिसर के आसपास श्रद्धालुओं के ठहरने, भोजन और अन्य आवश्यक सुविधाओं की भी व्यवस्था उपलब्ध है।
आस्था और लोकपरंपरा का जीवंत केंद्र है थावे धाम
थावे धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यहां आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु मां थावे भवानी की आराधना के साथ रहषु भगत की अद्भुत भक्ति को भी नमन करता है। स्थानीय मान्यता आज भी यही कहती है— “थावे धाम की यात्रा तभी पूर्ण मानी जाती है, जब रहषु भगत को भी प्रणाम किया जाए।”
