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“उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की ‘टाइड्स ऑफ टाइम’ का विमोचन किया

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डेस्क। उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष सीपी राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के संविधान सदन में लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित और राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति द्वारा लिखित पुस्तक ‘टाइड्स ऑफ टाइम: भारत’स हिस्‍ट्री थ्रू मुरल्‍स इन पार्लियामेंट’ का विमोचन किया। उपराष्ट्रपति ने सभा को संबोधित करते हुए इस अवसर पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और श्रीमती सुधा मूर्ति की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने संसद की भित्ति चित्रों की शाश्वत सुंदरता और गहन प्रतीकात्मकता को बखूबी दर्शाया है। उपराष्ट्रपति ने पीढ़ियों से लोगों को इतिहास से जोड़ने के उनके प्रयासों की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि संविधान सदन के भित्ति चित्र मात्र कलाकृतियां नहीं हैं, बल्कि भारत की सभ्यतागत यात्रा को प्रतिबिंबित करने वाली दृश्य कथाएं हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उत्तर में वैशाली से लेकर दक्षिण में कुडावोलाई प्रणाली तक, भारत में लोकतांत्रिक प्रथाएं निरंतर, समावेशी और समाज में गहराई से समाई हुई हैं। उन्होंने कहा कि ये परंपराएं एक व्यापक सभ्यतागत लोकाचार का हिस्सा हैं जो संवाद, सहमति और विविध विचारों के सम्मान को महत्व देता है, जिससे भारत को “लोकतंत्र की जननी” कहा जाता है।
उपराष्ट्रपति ने महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती को उद्धृत करते हुए भारत की ज्ञान, गरिमा, दानशीलता और सांस्कृतिक गहराई की समृद्धि को रेखांकित किया और कहा कि इस तरह की नींव स्वाभाविक रूप से समावेशिता और सभी के लिए सम्मान को बढ़ावा देती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में संसद भवन में पारंपरिक प्रतीकों के समावेश की सराहना की। उन्होंने संसद के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति के संबोधन के दौरान चोल वंश के पवित्र सेन्गोल के औपचारिक प्रदर्शन का भी उल्लेख किया और इसे आधुनिक भारत को उसकी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ने वाला एक सशक्त प्रतीक बताया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद एक जीवंत लोकतंत्र, संवाद, वाद-विवाद, असहमति और चर्चा के मूल सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यद्यपि चर्चा, वाद-विवाद और असहमति महत्वपूर्ण हैं, फिर भी अंततः इनका योगदान राष्ट्रीय हित में रचनात्मक निर्णय लेने में होना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने इस पुस्तक को भारत की सभ्यतागत यात्रा के लिए एक उल्लेखनीय सम्‍मान बताते हुए कहा कि इसमें 124 भित्ति चित्रों के वर्णन के माध्यम से इतिहास को जीवंत कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर महर्षि वाल्मीकि और चाणक्य जैसे महान विचारकों के ज्ञान और महावीर और गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक शिक्षाओं तक के इतिहास को समेटे हुए है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारत की प्रारंभिक लोकतांत्रिक परंपराओं, अशोक और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शासकों की उपलब्धियों और कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे स्मारकों और भक्ति आंदोलन जैसे आंदोलनों में परिलक्षित सांस्कृतिक समृद्धि को भी उजागर करती है।
उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम को श्रद्धांजलि अर्पित करती है, जिसमें दांडी मार्च जैसे आंदोलन और महात्मा गांधी एवं सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नेताओं के नेतृत्व को शामिल किया गया है। उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के 2047 तक के विकसित भारत के विजन का उल्‍लेख किया और “विकास भी, विरासत भी” के मार्गदर्शक सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि विकास और विरासत एक दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि संसद की दीवारों पर बने चित्र पहचान, मूल्यों और निरंतरता में प्रगति को स्थापित करके इस दर्शन को मूर्त रूप देते हैं।
सी.पी. राधाकृष्णन ने लेखिका की प्रशंसा करते हुए कहा कि सुधा मूर्ति सार्वजनिक जीवन में बुद्धिमत्ता, विनम्रता और सामाजिक प्रतिबद्धता का एक दुर्लभ संयोजन प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट जगत से सामाजिक सेवा और संसद तक की उनकी यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका योगदान हमेशा व्यापक जनहित से प्रेरित रहा है। उन्होंने इस पुस्‍तक को प्रकाशन को प्रकाशित करने में लोकसभा सचिवालय के प्रयासों की भी सराहना की।
उन्होंने सुब्रमण्यम भारती के शब्दों को दोहराते हुए इस बात पर बल दिया कि भाषा, क्षेत्र और संस्कृति में विविधता के बावजूद, भारत अपने राष्ट्रीय उद्देश्य में एकजुट है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा से एक रहा है और सदा एक ही रहेगा। उपराष्ट्रपति ने नागरिकों से “राष्ट्र प्रथम” की भावना को अपनाने का आह्वान करते हुए सभी से प्रतिबद्धता, ईमानदारी और गर्व के साथ राष्ट्र की सेवा में खुद को समर्पित करने का आग्रह किया।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला; केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और मनोहर लाल; राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश; और राज्यसभा सांसद तथा पुस्तक की लेखिका सुधा मूर्ति, संसद सदस्यों और लोकसभा एवं राज्यसभा सचिवालयों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ इस अवसर पर उपस्थित थे।

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