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सुख की तलाश में भटकता मानव: असली खुशी भीतर ही छिपी है

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  • संसारिक साधनों में उलझकर इंसान भूल रहा है कि सच्चा सुख मन की शांति और आत्मिक अनुभूति में निहित है
  • प्राकृतिक सुख
कामेश त्रिपाठी।

सुख मात्र मानव के लिए ही नहीं बल्कि समस्त प्राणियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है। कहीं ना कहीं यदि अध्ययन किया जाए तो यह दिखाई देता है कि सभी सुख की चाहत में ही इधर-उधर दौड़ रहे हैं सब की तलाश सबकी दौड़ सब की चाहत मात्र एक जगह जाकर रुकती है कि आखिर सुख कैसे प्राप्त किया जाए क्या ऐसा करूं कि जीवन सुखमय हो जाए क्या ऐसा मार्ग चुन लूं दुनिया की कौन सी सुविधा एकत्र कर लूं सुख मिल जाए और यही प्रश्न लिए हुए प्राणी जीवन भर साधनों को इकट्ठा करता है और एक दिन इस नश्वर संसार से हमेशा के लिए विदा हो जाता है परंतु उसकी दौड़ उसकी चाहत उसके बाद भी रुकती नहीं और वह पुनः अपनी इस चाहत पूर्ति के लिए इसी संसार में आता है। अर्थात उसकी सुख प्राप्ति की दौड़ जीवन भर ही नहीं अपितु जन्म जन्मांतर तक चलती रहती है।ऐसा नहीं है कि सुख की प्राप्ति किसी को होती नहीं। बल्कि सुख की चाहत में वह सही मार्ग नहीं चुन पाता है और संसार के विभिन्न संसाधनों में फंसकर रह जाता है और वास्तविक मार्ग से भटक जाता है।

महत्वपूर्ण यह नहीं की सुख की खोज की जाए, बल्कि महत्वपूर्ण तो यह है कि सुख की प्राप्ति की जाए।सुख कोई सामान नहीं है कि गया बाजार और खरीद लाया। सुख तो मन की शांति का एहसास है जो कि संसार में खोजना नहीं पड़ता। इसे पाने के लिए अपने अंदर प्रवेश करना पड़ेगा,अपनी अंतरात्मा में शांति पूर्वक प्रवेश करना और यह अनुभूति करना कि आज मैं सबसे सुखी हूं यही सुख है। परंतु अपने अंदर प्रवेश करना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है वह तो मनोवेग है । आज हर व्यक्ति अपने को बाह्य जगत में प्रतिष्ठित करता है। अपनी सोच को बाहरी दुनिया की वस्तुओं संसाधनों में लगा रहा है वह यह भूल गया है कि वास्तविक सुख संसाधनों में नहीं खुद में प्राप्त हो सकता है।

मानव प्राणी एक ऐसा प्राणी है जो की सोच विचार में अन्य प्राणियों की अपेक्षा अग्रणी है परंतु जरूरत सिर्फ सोचने की क्षमता अधिक होने से पूरी नहीं होती उसके लिए महत्वपूर्ण होती है सोच की दिशा आखिर हम किस दिशा में कितनी और किस गति से सोच रहे हैं ।आज जैसा कि कहा जाता है कि व्यक्ति अपने दुख से कम औरों के सुख से ज्यादा दुखी है कहीं ना कहीं यह बात प्रमाणित लगती है और इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि आज हम जो भी कार्य करने के लिए कदम उठाते हैं पहले और लोगों को देखते हैं कि क्या ऐसा करने से हम अपने पड़ोसी से आगे जा सकते हैं उसके बढ़ते कदम कहीं ना कहीं पड़ोसी या और लोगों के कदमों पर निर्भर दिखाई देते हैं वह कुछ भी करने को सोचता है तो पहले उसके मन में सवाल खड़ा हो जाता है यह करने पर लोग क्या कहेंगे लोगों की सोच क्या है लोग देखेंगे या जानेंगे क्या-क्या सोचेंगे।अर्थात वह अपनी इच्छा की पूर्ति भी लोगों के नजरिए से करना चाहता है उसकी अंतरात्मा कहती है कि चलो एक घंटा शांति से बैठे रहे कि चलो कहीं घूम आए या चलो कहीं गीत गुनगुना लें परंतु वह भी अपनी आत्मा की इस मधुर पुकार तत्क्षण ठोकर मारता है कि लोग एकांत में बैठे देखेंगे तो पागल समझेंगे लोग घूमते देखेंगे तो आवारा समझेंगे लोकगीत गुनगुनाते सुनेंगे हसेंगे । अपनी आत्मा खुद की सुख शांति के लिए ऐसा करना चाहती है पर हम लोगों के नजरिए से जीना चाहते हैं कभी भी हम अपनी इच्छा अपने नजरिए से खुद को देख नहीं पाते और फिर भी सुख की चाहत में दौड़ते है।

“सुख की चाहत में दौड़ रहे दुख की गठरी को भूल गए”

हम दुख की गठरिया अपने सिर पर रख कर घूम रहे हैं और वह गठरी कुछ और नहीं हमारी सोच है।सच यह है कि हम चाहते हैं कि लोग हमें देखें तो मेरी प्रशंसा करें कि हमसे सलाम करें कि हमें डरे या फिर लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं इन्हें ऐसा होना चाहिए अर्थात हर समय हमारे अंदर एक सवाल हमें अपनी अंतरात्मा की गहराई में उतरने नहीं देता और तब तक हम वह शांति वह सुख प्राप्त न कर सकेंगे जबतक हम ऐसे सवालों से खुद परे न कर दें। और जब तक कि हम उस की तरफ उन्मुख न होजाएंगे जिनकी चाहत वास्तव में हमारे अंदर से उठ रही है। और वह वास्तविक चाहत हमारे अंतर्मन की पुकार है जिसे सुनना महसूस करना ही हमारा वास्तविक सुख का मार्ग तय करता है।

चाहत व्यक्ति की वाह्य शारीरिक संरचना में नहीं होती।कभी सोचो और सूक्ष्म दृष्टिपात करो खुद पर,की क्या हमारे शरीर के विभिन्न अंग किसी चीज की या किसी भाव की मांग करते हैं ऐसा कभी हुआ कि हाथ में कुछ करने की चाहत उठे या पैर कहे की मत चलो या जुबान कहे मत बोलो या आंखें कहे मत देखो कभी नहीं वह सब तो मात्र एक यंत्र हैं एक माध्यम है इस चेतना के जो की अंगों को अपने अनुसार क्रियाशील बनती हैं। कभी सोचो कि क्या है कि शरीर के विभिन्न अंग पड़े रह जाते हैं और निष्क्रिय हो जाते हैं शरीर से क्या है जो निकल गया है तो सारे अंग बेकार हो जाते हैं और क्या है कि जब वह है तो सब क्रियाशील है और यदि वह कोई अदृश्य चेतन है तो निश्चित ही सुख की उसकी भी अपनी चाहत होगी जो कि उसके अनुसार पूर्ति होने पर भी सुख की अनुभूति कर सकेगा क्योंकि जिसकी चाहत पूरी होगी वही तो सुखी होगा उस चेतन की या उस आत्मा की चाहत है खुद को सुंदर बनाने की,और हम लगे बाजार से गहने खरीदने की इत्र खरीदने या सुंदर कपड़े पहने सोचो हम शरीर को लग जाते हैं सुंदर बनाने की चाहत में। और हम सवारते हैं शरीर के अंगों को कभी महसूस करो कि पानी हमेशा गतिमान होता है किसी तरह थोड़ा भी पानी गिराओ तो वह नीचे की तरफ चल पड़ता है पहाड़ से निकली नदी रास्ते नहीं खोजती चल पड़ती है सागर की तरफ उसे रास्ते में बांध बना कर खेत की सिंचाई करो कि विद्युत संयंत्र लगाओ, कोई फर्क नहीं जो सागर तक जा कर ही रुकेगी।बूंद की चाहत भी सिंधु है एक बूंद भी अपनी यात्रा सागर की तरफ ही करती है और वही स्थिति इस चेतन की भी है इसकी पूरी कोशिश उस विराट की तरफ है अब हम उसे धन में उलझाएं पद से उलझाएं सांसारिक संसाधनों में बांधे तो भला यह कैसे सुख की अनुभूति कर सकता है इसकी गति तो निरंतर उस परम चेतना की तरफ ही रहेगी।

हमारे अंदर कविता निकलती है, चित्रकला निकलती है, नृत्य गतिमान होता है हम उसे दबा देते हैं कि नहीं इससे क्या होगा हमें तो चिकित्सक बनना है, इंजीनियर बनना है, शासन करना है, प्रधानमंत्री बनना है। और हम सोचते हैं कि इन पदों पर पहुंच के हम सुखी होंगे परंतु मिलता वही है कि हम सिर्फ दुख की गठरी अपने सिर पर रखे हुए सुख की तलाश में दौड़ते रह जाते हैं परंतु सुख की एक झलक पाने में नाकाम रह जाते हैं। वास्तविक सुख तो वास्तव में हमारी सोच और एहसास में निहित होता है।

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