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UP Archaeology Course 2026: सरस्वती-सिंधु सभ्यता और प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा पर व्याख्यान

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प्राचीन ज्ञान, तकनीक और जल प्रबंधन पर विशेषज्ञ ने दी जानकारी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम, 2026” के छठवें दिन आज मुख्य वक्ता डॉ. नरेंद्र परमार, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा तथा उपनिदेशक, संग्रहालय एवं पुरातत्व विभाग, चंडीगढ़ ने “सरस्वती-सिंधु सभ्यता: भारतीय ज्ञान परंपरा के नए आयाम” विषय तथा “प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा (Early Indian Knowledge System)” के विभिन्न आयामों पर अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं सारगर्भित विचार मंथन किया गया। इस अवसर पर उन्होंने विषय से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों एवं ज्ञान-पद्धतियों का डेमोंस्ट्रेशन (प्रायोगिक प्रदर्शन) भी प्रस्तुत किया, जिससे प्रतिभागियों को विषय की अवधारणाओं को अधिक व्यावहारिक एवं सरल रूप में समझने का अवसर प्राप्त हुआ।

यह जानकारी पुरातत्व विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने दी। उन्होंने बताया कि व्याख्यान में डॉ. परमार ने भारत में ज्ञान परंपरा के प्राचीन विकासक्रम को पुरातात्त्विक साक्ष्यों के माध्यम से समझाते हुए सरस्वती-सिंधु सभ्यता को प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण आधार के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय समाज में विकसित ज्ञान केवल सैद्धांतिक न होकर प्रकृति, पर्यावरण, तकनीक, उत्पादन, कृषि और सामाजिक जीवन के व्यावहारिक अनुभवों से भी गहराई से जुड़ा हुआ था।

धोलावीरा की जल प्रबंधन प्रणाली और प्राचीन तकनीक पर चर्चा

निदेशक ने बताया कि सरस्वती-सिंधु सभ्यता के पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर नगरीय नियोजन, वास्तुकला, जल एवं पर्यावरण प्रबंधन, मापन एवं गणितीय ज्ञान, कृषि, शिल्प एवं प्रौद्योगिकी, धातुकर्म, सामुद्रिक एवं दूरवर्ती व्यापार तथा प्रकृति एवं जीव-जगत संबंधी ज्ञान के विभिन्न आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विशेष रूप से धोलावीरा की जल-संग्रह एवं जल-प्रबंधन प्रणाली, सुव्यवस्थित नगरीय योजना, विकसित जल-निकासी व्यवस्था, मानकीकृत बाट-माप तथा शिल्प एवं तकनीकी परंपराओं का उल्लेख करते हुए इन्हें उस काल की वैज्ञानिक समझ, तकनीकी दक्षता और पर्यावरणीय अनुकूलन क्षमता का महत्वपूर्ण प्रमाण बताया।

रेनू द्विवेदी ने बताया कि व्याख्यान के दौरान डॉ. परमार ने प्रारंभिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों से संबंधित विभिन्न अवधारणाओं एवं पुरातात्त्विक साक्ष्यों का प्रायोगिक प्रदर्शन करते हुए प्रतिभागियों को उनके वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्षों से परिचित कराया। इस प्रदर्शन के माध्यम से प्रतिभागियों ने प्राचीन ज्ञान, तकनीकी कौशल और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के बीच संबंधों को प्रत्यक्ष रूप से समझा। यह प्रस्तुति विशेष रूप से प्रतिभागियों के लिए अत्यंत रोचक, संवादात्मक एवं ज्ञानवर्धक रही।

इस अवसर पर निदेशालय की निदेशक रेनू द्विवेदी ने मुख्य वक्ता डॉ. नरेंद्र परमार का पौधा एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा और सरस्वती-सिंधु सभ्यता का अध्ययन भारत की वैज्ञानिक, तकनीकी एवं पर्यावरणीय दृष्टि के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि डॉ. नरेंद्र परमार के शोधपरक एवं विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान तथा प्रायोगिक प्रदर्शन ने प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान परंपरा और पुरातात्त्विक विरासत के विविध आयामों को समग्र एवं व्यावहारिक दृष्टि से समझने का अवसर प्रदान किया। कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑफलाइन मोड तथा 50 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन मोड के माध्यम से सहभागिता करते हुए व्याख्यान एवं प्रदर्शन का लाभ प्राप्त किया।

कार्यक्रम के अंत में श्री राम विनय ने मुख्य वक्ता, निदेशक, अतिथियों, प्रतिभागियों एवं कार्यक्रम के आयोजन में सहयोग करने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी मंच संचालन डॉ. मनोज कुमार यादव द्वारा किया गया।

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