पाषाण युग से सरस्वती-सिंधु सभ्यता तक खुलेगा इतिहास का पन्ना, कोणार्क और सिरपुर की विरासत पर भी होगी चर्चा
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में पुरातत्व और विरासत के प्रति रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहास प्रेमियों के लिए विशेष अवसर है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, संस्कृति विभाग की ओर से 20 अगस्त से 3 सितंबर 2026 तक ‘पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम’ आयोजित किया जा रहा है। इसका शुभारंभ 20 अगस्त (गुरुवार) को छतर मंजिल परिसर, कैसरबाग स्थित पुरातत्व निदेशालय के सभागार में हुआ। इस कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होकर सहभागिता की, जबकि 50 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से प्रतिभाग किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास (पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद्, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार) ने अपने की-नोट व्याख्यान में पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति आमजन, विशेषकर बच्चों एवं विद्यार्थियों में जागरूकता विकसित करने की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों की समृद्ध धरोहरें विभिन्न रूपों में आज भी हमारे आसपास विद्यमान हैं। इन्हें पहचानने, समझने एवं इनके ऐतिहासिक महत्व को जानने के लिए इतिहास एवं पुरातत्व एक-दूसरे के पूरक विषय हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने आसपास स्थित प्राचीन स्थलों, स्मारकों, पुरावशेषों एवं सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जिज्ञासा विकसित करने तथा उनके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।
युवा पीढ़ी को विरासत संरक्षण से जोड़ने पर जोर, पाठ्यक्रम में होंगे विशेष सत्र
उन्होंने कहा कि विरासत का संरक्षण केवल सरकार अथवा पुरातत्व विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज और विशेष रूप से युवा पीढ़ी की सहभागिता से ही हमारी सांस्कृतिक विरासत को भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता प्रो. किरन कुमार थपल्याल, पूर्व विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, ने की।

प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने इस पर जानकारी देते हुए बताया कि, पाठ्यक्रम के आगामी सत्रों में ईंटों से निर्मित प्राचीन संरचनाओं के अध्ययन, पाषाण उपकरणों से धातु तक प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के विकास और भारतीय पुरावशेष एवं स्मारक संरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर विशेषज्ञ व्याख्यान होंगे। इसके साथ ही भारत के ईंट निर्मित स्तूपों और उनके संरक्षण की चुनौतियों, विशेष रूप से महाराष्ट्र के नालासोपारा स्थित स्तूप के संदर्भ में चर्चा की जाएगी। प्रतिभागियों को यह भी बताया जाएगा कि पुरातात्विक अवशेषों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक तरीकों के माध्यम से मानव अतीत को किस तरह समझा जाता है।
साथ ही कार्यक्रम में प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा, सरस्वती-सिंधु सभ्यता और भारतीय ज्ञान प्रणालियों के नए आयामों पर भी विशेष सत्र रखा गया है। इसके अलावा भारतीय चित्रकला में काव्य, प्रेम और विरह तथा काव्य एवं चित्रकला में नायक-नायिका के चित्रण जैसे विषयों को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। सरयू-पार क्षेत्र के प्राचीन बसावट पैटर्न और भू-आकृतिक अध्ययन के माध्यम से बलरामपुर, बहराइच, गोंडा और श्रावस्ती जैसे जिलों के पुरातात्विक महत्व को समझाया जाएगा। शिक्षकों और विद्यार्थियों के माध्यम से विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी विशेष चर्चा होगी।
पुरातत्व पाठ्यक्रम में सिक्कों, सिरपुर और कोणार्क पर होंगे विशेष सत्र
इसके अलावा पाठ्यक्रम के आने वाले सत्रों में सिक्कों के ऐतिहासिक चलन, विनिमय, विकास और प्रसार जैसे विषयों पर जानकारी दी जाएगी। गुजरात के राज्य संरक्षित स्मारकों के संरक्षण की प्रक्रिया और उनसे जुड़ी चुनौतियों पर भी विशेषज्ञ चर्चा करेंगे। इसके साथ ही पुरातात्विक स्थल सिरपुर की प्रमुख विशेषताओं, कोणार्क की मूर्तिकला और कोणार्क के अधूरे स्थापत्य पर विशेष व्याख्यान होंगे। पुरातत्व में आपातकालीन संरक्षण और बचाव कार्य यानी सैल्वेज ऑपरेशन की प्रक्रिया को भी समझाया जाएगा। इन सत्रों के माध्यम से प्रतिभागियों को पुरातत्व को केवल इतिहास पढ़ने के बजाय वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण के व्यापक क्षेत्र के रूप में समझने का अवसर मिलेगा।
कार्यक्रम के अलग-अलग सत्रों में विभिन्न विषयों पर पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास, डॉ. अनिल कुमार, इंदु प्रकाश, डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. नीरज राय, डॉ. नरेंद्र परमार, डॉ. विजय माथुर, डॉ. दुर्गेश कुमार श्रीवास्तव,साधना व्यास, डॉ. विनय कुमार सिंह, डॉ. पंकज शर्मा, डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा, डॉ. राजीव द्विवेदी और पद्मश्री डॉ. बी.आर. मणि सहित कई विशेषज्ञ अपने विचार और अनुभव साझा करेंगे। विभिन्न सत्रों में व्याख्यान के साथ प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) भी आयोजित किए जाएंगे, जिससे प्रतिभागियों को विषयों की व्यावहारिक समझ मिल सके।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया 3 सितंबर को समापन एवं प्रमाणपत्र वितरण समारोह के साथ पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम का समापन होगा। करीब दो सप्ताह तक चलने वाला यह आयोजन विद्यार्थियों और शोधार्थियों को देश की प्राचीन विरासत, पुरातात्विक स्थलों, स्मारकों और संरक्षण तकनीकों को विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में समझने का मंच देगा। उन्होंने बताया राज्य पुरातत्व निदेशालय की यह पहल प्रदेश में पुरातत्व और विरासत संरक्षण के प्रति नई पीढ़ी की रुचि बढ़ाने के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति जागरूकता को मजबूत करेगा।
