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“प्राचीन भारत में कला का विकास: हड़प्पा सभ्यता के विशेष संदर्भ में” विषय पर व्याख्यान आयोजित

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हड़प्पाई कला परंपरा को भारतीय सांस्कृतिक विकास की आधारशिला बताया गया

लखनऊ। संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के अंतर्गत राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” (26 जुलाई से 07 अगस्त, 2026) के अंतर्गत आज “प्राचीन भारत में कला का विकास: हड़प्पा सभ्यता के विशेष संदर्भ में” विषय पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में इतिहास, पुरातत्व, कला इतिहास, संस्कृति एवं संग्रहालय अध्ययन से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. अनिल कुमार, विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में प्राचीन भारतीय कला की विकास यात्रा का विस्तृत विवेचन करते हुए हड़प्पा सभ्यता को भारतीय कलात्मक परंपरा की महत्वपूर्ण आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय कला का इतिहास केवल मूर्तियों, मंदिरों और स्थापत्य तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी जड़ें सिंधु-सरस्वती अथवा हड़प्पा सभ्यता की विकसित नगरीय संस्कृति में निहित हैं।

हड़प्पा सभ्यता की कला ने रखी भारतीय सांस्कृतिक विरासत की मजबूत नींव

प्रो. अनिल कुमार ने हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेषों-मृण्मूर्तियों, कांस्य प्रतिमाओं, पाषाण मूर्तियों, मुहरों, मनकों, आभूषणों तथा चित्रित मृद्भांडों का उल्लेख करते हुए बताया कि लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप में कला और शिल्प की अत्यंत विकसित परंपरा विद्यमान थी। उन्होंने प्रसिद्ध कांस्य निर्मित “नृत्यांगना” प्रतिमा, दाढ़ीधारी पुरुष की प्रस्तर प्रतिमा तथा विभिन्न पशु-अंकित मुहरों के उदाहरणों के माध्यम से हड़प्पा काल के कलाकारों की तकनीकी दक्षता और सौंदर्यबोध को रेखांकित किया।

अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि हड़प्पा सभ्यता की कला में यथार्थवाद, प्रतीकवाद तथा उपयोगिता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। मुहरों पर अंकित पशु-आकृतियाँ, ज्यामितीय अलंकरण तथा धार्मिक प्रतीक उस काल की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि हड़प्पाई कला के अनेक तत्व आगे चलकर भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में विभिन्न रूपों में विकसित हुए, जिससे भारतीय कला की निरंतरता और सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया को समझा जा सकता है।

प्रो. अनिल कुमार ने डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय कला के अध्ययन को केवल कलात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में भी समझने का मार्ग प्रशस्त किया। भारतीय कला में निहित प्रतीकों, सांस्कृतिक मूल्यों तथा ऐतिहासिक संदर्भों की उनकी व्याख्या आज भी कला इतिहास के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत है।

हड़प्पा सभ्यता की कला पर विशेषज्ञों ने साझा किए महत्वपूर्ण विचार

इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने मुख्य वक्ता एवं उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय संस्कृति, कला और इतिहास के ऐसे मनीषी थे, जिन्होंने भारतीय विरासत के अध्ययन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा कि स्मृति व्याख्यानमाला का उद्देश्य उनके विचारों और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना तथा भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देना है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी खेमका, सहायक निदेशक (सज्जा कला), राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया। उन्होंने विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए मुख्य वक्ता का परिचय कराया तथा कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डाला।
व्याख्यान के उपरांत आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने हड़प्पा सभ्यता की कला, प्रतीकों, धार्मिक मान्यताओं तथा भारतीय कला पर उसके प्रभाव से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे। मुख्य वक्ता ने इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए विषय के विभिन्न आयामों को विस्तार से स्पष्ट किया। कार्यक्रम अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं शोधपरक रहा। उपस्थित विद्वानों, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने इसे भारतीय कला की प्रारंभिक परंपराओं तथा हड़प्पा सभ्यता की सांस्कृतिक उपलब्धियों को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर बताया।

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