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प्रशासनिक सुधारों की जरूरत और चुनौतियां

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लोककल्याण के लिए सक्षम प्रशासन जरूरी

हृदयनारायण दीक्षित।

प्रशासन तंत्र लोककल्याणकारी कामों का लाभ आमजनों तक ले जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने प्रशासन तंत्र को सक्रिय किया है। प्रधानमंत्री नीति व निर्णयों में तेज रफ्तार गतिशील हैं। वे सारी कार्यसंस्कृति बदल रहे हैं। आखिरकार सभी सुधारों का अंतिम उपकरण प्रशासन तंत्र है। नीतियों और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन प्रशासन तंत्र द्वारा ही होता है। नौकरशाही और प्रशासनिक तंत्र में जड़ता है। जिम्मेदार अधिकारी भी अपने कर्तव्यों के निर्वाहन में जनता से दूरी बनाए रखते हैं। देश में अधिकारी तंत्र और जनप्रतिनिधियों के मध्य अच्छे सम्बंध नहीं हैं। जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक तंत्र में तनाव रहता है। मारपीट की नौबत तक आ जाती है। आदर्श लोकतंत्र के लिए यह अच्छी स्थिति नहीं है।

सो उत्कृष्ट, निष्ठावान और कार्यकुशल प्रशासन आधुनिक भारत की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। हमारे संविधान तंत्र में सरकारें संसद व विधानमण्डलों के सामने जवाबदेह हैं। जनप्रतिनिधि भी प्रत्येक 5 वर्ष के बाद आम जनता के समक्ष होते हैं। लेकिन प्रशासन तंत्र की कोई जवाबदेही नहीं। प्रशासन तंत्र संवेदनहीन और निष्क्रिय है और सरकारें सक्रिय। भारतीय प्रशासन का इतिहास पुराना है। प्राचीन प्रशासन की प्रशंसा फाहयान ने भी “शासन प्रबंध सुव्यवस्थित, उदार व सौम्य” बताकर की है। मौर्यकाल (340 ई0पूर्व) में भी सुगठित राष्ट्रनिष्ठ शासन तंत्र था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में प्रशासन तंत्र का खूबसूरत विवरण है। सिंधुघाटी सभ्यता (2200 ई0पूर्व से 1750 ई0पूर्व तक) के प्रशासन को ह्वीलर व पिगाट जैसे विद्वानों ने भी सुगठित बताया है। उत्तर वैदिक काल व वैदिक काल का प्रशासन समाज के साथ एकताबद्ध और उत्तरदायी था। अंग्रेजी शासकों ने अपने साम्राज्य को मजबूत करने का प्रशासन तंत्र बनाया था। अंग्रेज सरकारों ने भी प्रशासनिक सुधारांे के लिए कई आयोग बनाए थे। प्रशासन ही सत्ता चलाने का उपकरण था। वे स्वाभाविक ही प्रशासनिक सुधारों पर सजग थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में लम्बे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस ने प्रशासनिक सुधारों पर कोई ठोस काम नहीं किया। प्रशासन परम स्वतंत्र होने की स्थिति का उपभोग करता आया है।

भारतीय संविधान की उद्देशिका व नीति निदेशक तत्व सरकार व प्रशासन तंत्र के मार्गदशÊ हैं। वे सुस्थापित विधि नहीं बल्कि सरकार व प्रशासन के कामकाज की आत्मा है। प्रशासन तंत्र इन सूत्रों से नहीं जुड़ता। स्वतंत्र भारत (1951) में प्रशासन की कार्यशैली पर एन0डी0 गोरेवाला की रिपोर्ट ‘लोक प्रशासन पर प्रतिवेदन’ नाम से आई। रिपोर्ट के अनुसार “कोई भी लोकतंत्र स्पष्ट, कुशल व निष्पक्ष प्रशासन के अभाव में सफल नियोजन नहीं कर सकता।” इस रिपोर्ट में अनेक उपयोगी सुझाव थे लेकिन क्रियान्वयन नहीं हुआ। 1952 में केन्द्र ने प्रशासनिक सुधारों पर विचार करने के लिए पाल एपिलबी की नियुक्ति की। उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया और ‘लोक प्रशासन सर्वेक्षण का प्रतिवेदन’ प्रस्तुत किया। रिपोर्ट में अनेक महत्वपूर्ण सुझाव थे। लेकिन जड़ता नहीं टूटी। स्वाधीनता के 19 बरस बाद पहला प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) बना। मोरारजी देसाई अध्यक्ष थे, वे मंत्री हो गए। आयोग ने हनुमंतैया की अध्यक्षता में काम बढ़ाया। आयोग का पहला प्रतिवेदन “नागरिकों की व्यथा दूर करने की समस्या” शीर्षक से 20 अक्टूबर 1966 में आया। प्रशासन बनाम आमजन की व्यथा से पूरा देश पीड़ित है लेकिन इस महत्वपूर्ण बिन्दु की उपेक्षा हुई। आयोग ने केन्द्रीय प्रशासन व राज्य प्रशासन पर अलग-अलग सुझाव दिये। रिपोर्ट में आर्थिक नियोजन को आर्थिक प्रशासन के रूप में पहचानने के भी उल्लेख थे।

प्रशासन का रूप रंग और कार्यव्यवहार जस का तस बना रहा। पहले प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट (1970) के 35 साल बाद सितम्बर 2005 में वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग बना। मोईली ने 2009 में पद त्यागा। इस आयोग ने भी केन्द्रीय प्रशासन के ढांचे के साथ राज्य प्रशासन पर भी सिफारिशें की। जिला प्रशासन को सक्षम बनाने की भी महत्वपूर्ण संस्तुतियां की। इस रिपोर्ट में आतंकवाद की चुनौती पर भी सुझाव थे। मनरेगा के क्रियान्वयन की भी शल्य परीक्षा थी। समूची रिपोर्ट पर मंत्रियों के समूह को विचार का काम सौंपा गया। आयोग की सिफारिशों के अंत में कहा गया था “सरकार के दृष्टिकोण में आवंटन आधारित विकास कार्यक्रमों से पात्रता आधारित विकास कार्यक्रमों की ओर अन्तरण हुआ है। सभी क्षेत्रों में विकास पर जोर है। केन्द्रीय बजट बढ़ा है। इस सबके कारण संस्थागत प्रशासनिक व वित्तीय प्रबंधन का सुदृढ़ीकरण जरूरी है।” यहां विकास के सभी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक प्रबंधन पर जोर है। लेकिन असली दिक्कत दूसरी है। सभी कार्यक्रमों को अंतिम परिणिति तक पहुंचाने वाले प्रशासन तंत्र की प्रथम वरीयता परिणाम देना नहीं अपितु अपनी सेवा सुरक्षा है।

संविधान विशेषज्ञ मंत्रिपरिषद को अस्थाई और प्रशासन को स्थाई सरकार कहते हैं। यह उचित भी है। सरकार का कार्यकाल पांच वर्ष है और प्रशासन का कार्यकाल सतत् चलता है। लेकिन वास्तविक क्रियान्वयन की शक्ति प्रशासन मंे निहित है। सरकारें पेयजल की समस्या पर बजट देती हैं। व्यवस्था प्रशासन के हाथ में है। बजट का बड़ा भाग प्रायाः खर्च नहीं हुआ। प्रशासन तंत्र चाहता तो खर्च हो जाता। योजनाएं बनती हैं, क्रियान्वित नहीं होती। योजना की प्राक्कलन राशि बढ़ती जाती है। उत्तरदायित्व किसका? तमाम बैंक अधिकारियों ने बेरोजगारो को टाल दिया। कई राज्यों में प्रशासन का राजनैतिकरण हुआ है। कुछेक प्रशासनिक अधिकारी सत्तादल के कार्यकर्ता जैसा आचरण करते हैं। आई0ए0एस0 अधिकारियों के एक समागम में एक अधिकारी ने दूसरे से पूछा “पार्टनर! आपके जिले की जनसंख्या क्या है?” अगले ने कहा “ओनली ऐट सिर्फ आठ।” पहले ने पूछा “कुछ समझ में नहीं आया।” अगले ने कहा “आठ नेता सी0एम0 से मिलते हैं। यही जनसंख्या है। इन्हीं को सेट रखना हमारी प्राथमिकता है।” बेशक यह मजाक है लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं।

केन्द्र की नीति और नीयत की प्रशंसा हो रही है। नीति और नीयत को क्रियान्वित करने वाला मुख्य उपकरण प्रशासन है। प्रशासन को नये आर्थिक सुधारों के क्रियान्वयन का सक्रिय उपकरण बनाना ही होगा। इसी तरह समाज कल्याण से जुड़ी योजनाओं, कृषि, स्वरोजगार व गरीबी से संघर्ष के काम में ढिलाई करने वाले प्रशासन तंत्र की मनोदशा में बदलाव जरूरी है। प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशें उपयोगी हैं। भारत की नई चुनौतियों के बरक्स प्रशासन के सामने भी चुनौतियों का नया स्वरूप आया है।

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